आज से 38 साल पहले बैंकों में नामांकन की सुविधा नहीं थी। इसलिये उसी समय से बचत खाता हो अथवा आवर्ती या सावधि वगैरह सभी खाते अपने विश्वसनीय पारिवारिक सदस्य या साझेदार वगैरह के साथ संयुक्त नाम से निम्न लाभों के चलते रखे जाने की परम्परा आज भी कारगर साबित हो रही है –

१) संयुक्त खाते में जैसा निर्देशित रहता है उसी अनुरूप खाता संचालित होता है इसलिये आप पूरी निश्चिन्तता से रह सकते हैं।

२) साधारणतया संयुक्त खाता में संयुक्त नाम सारे भरोसेमंद वालों के ही होते हैं इसलिये खाता संचालन सुविधापूर्वक होता रहता है।

३) साधारणतया इस तरह के खातों में किसी एक को भी संचालन का पूरा अधिकार निर्देश में लिखा दिया जाता है ताकि जो भी उपलब्ध हो वह उसे संचालित कर लेता है।

४) आजकल अनेक बैंकों में अपनी शाखा के अलावा अन्य शाखा में केवल खाताधारक ही खाता का संचालन कर सकता है।इस हालत में संयुक्त खाता बहुत ही लाभकारी सिद्ध हो रहा है।

५) इस तरह के खातों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी कारण से किसी धारक की मृत्यु हो जाय तो भी खाता चालू रखा जा सकता है अर्थात मृत्यु प्रमाणपत्र दे उस धारक का नाम हटा दिया जाता है।

६) आज-कल संयुक्त नाम से खाता होने के बावजूद सभी खाताधारक मिलकर नामांकन भी अंकित करा रहे हैं।इस तरह से खाता रखने पर भी बहुत ही युक्तिसंगत तर्क हैं जिसे हम नजर अंदाज नहीं कर सकते।

आजकल अनेक कारणों के चलते खासकर साझेदारी वाले मामलों में  संयुक्त खाते में खाताधारक अपना क्रम बदलने के लिये जब बैंकों से आग्रह करते हैं तब उचित दिशा निर्देश के अभाव के साथ-साथ कम्प्यूटर प्रणाली (साफ्टवेयर ) में  सुविधा न होने के कारण  बैंक अधिकारी असमर्थता जता देते हैं। जबकि शेयरों वगैरह में क्रम परिवर्तन की सुविधा उपलब्ध है ।

यह सही है कि आयकर अपने नियमानुसार संयुक्त खातों में प्रथम धारक को ही जिम्मेदार कहिये या उत्तरदायी मानता है। इसलिये संयुक्त खाता धारकों को क्रम-परिवर्तन कराने के पहले इस बिन्दु पर सोच लेना उचित रहेगा।

उपरोक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रख केन्द्रीय बैंक (रिजर्व बैंक) को इस दिशा में सकारात्मक रूख अपनाते हुए क्रम परिवर्तन की सुविधा के लिये उचित दिशानिर्देश जारी करने का निवेदन है। 

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’बीकानेर 7976870397 / 9829129011 (W)

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